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13 करोड़ वोटरों का सच क्या है? SIR, Form 6 और ‘वोट चोरी’ पर चुनाव आयोग का पूरा जवाब

📅 06 Oct 2026🕐 08:48 PM
SIR पर उठे सभी सवालों का चुनाव आयोग ने दिया जवाब, 13 करोड़ नाम, Form 6, डेटाबेस और ‘वोट चोरी’ के आरोप पर जानिए पूरी बात

नई दिल्ली: मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर राजनीतिक बहस के बीच चुनाव आयोग ने कई अहम सवालों पर अपना पक्ष रखा है। 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने के दावे से लेकर Form 6 में बदलाव, वोटर डेटाबेस को सेंट्रलाइज करने, ERO के अधिकार, पहली बार वोटर बनने वालों और SIR को “वोट चोरी” का तरीका बताए जाने तक कई मुद्दों पर आयोग की ओर से स्पष्टीकरण सामने आया है।

13 करोड़ वोट काटे गए या मतदाता सूची की समीक्षा हुई?

SIR को लेकर सबसे बड़ा सवाल 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर है। चुनाव आयोग के अनुसार इसे सीधे तौर पर “13 करोड़ लोगों के वोट काट दिए गए” कहना सही नहीं है।

आयोग की ओर से बताए गए आंकड़ों में करीब 2 करोड़ 80 लाख मतदाता मृत पाए गए, लगभग 3 करोड़ मतदाता गैरहाजिर मिले, करीब 6.3 करोड़ मतदाताओं के स्थान बदलने की जानकारी सामने आई और लगभग 1 करोड़ डुप्लीकेट मतदाताओं की पहचान की गई।

आयोग का तर्क है कि ये सभी श्रेणियां मतदाता सूची के सत्यापन और शुद्धिकरण की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

सवाल नंबर 2: क्या Form 6 में बदलाव किया गया?

Form 6 को लेकर भी सवाल उठे। चुनाव आयोग का जवाब है कि Form 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

आयोग के अनुसार Form 6 और घोषणा फॉर्म को एक साथ जोड़ा गया है। वहीं प्रक्रिया से जुड़े OTP प्रावधानों में भी निर्धारित परिस्थितियों में छूट दी गई।

इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया को जारी रखना बताया गया है।

SIR का आदेश कैसे जारी हुआ?

SIR के आदेश को लेकर भी सवाल उठाए गए। चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि आदेश निर्धारित अधिकार और प्रक्रिया के तहत जारी किया गया।

आयोग ने यह भी कहा कि संबंधित कमिश्नरों के बीच सहमति से काम का बंटवारा हुआ था। SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी कानूनी चुनौती दी गई और अदालत ने प्रक्रिया से जुड़े आदेशों पर सुनवाई की।

क्या वोटर डेटाबेस को सेंट्रलाइज किया गया?

विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग पर वोटर डेटाबेस को केंद्रीकृत करने का आरोप लगाया गया।

इस पर चुनाव आयोग ने साफ किया कि वोटर डेटाबेस को सेंट्रलाइज नहीं किया गया है।

आयोग के अनुसार मतदाता सूची का डेटाबेस अभी भी डिसेंट्रलाइज्ड है। राज्य स्तर पर संबंधित क्षेत्र के Electoral Registration Officer (ERO) मतदाता सूची तैयार करते हैं।

इसका रखरखाव और निगरानी Chief Electoral Officer (CEO) के मार्गदर्शन में होती है।

ERO के अधिकारों पर भी आयोग की सफाई

ERO के अधिकारों को लेकर उठे सवाल पर आयोग ने कहा कि ERO के सभी वैधानिक और कानूनी अधिकार पूरी तरह बरकरार और सुरक्षित हैं।

यानी SIR के दौरान भी मतदाता सूची तैयार करने और संशोधन से संबंधित निर्धारित कानूनी प्रक्रिया ERO के स्तर पर जारी रहती है।

First Time Voter के नाम जुड़ने में क्या समस्या है?

पहली बार वोटर बनने वाले युवाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए।

आयोग के अनुसार पात्र व्यक्ति के लिए मतदाता सूची में नाम जुड़ने की प्रक्रिया उपलब्ध है। 18 वर्ष की पात्रता पूरी करने के बाद व्यक्ति मतदाता बनने के लिए आवेदन कर सकता है।

आयोग के अनुसार साल में चार qualifying dates निर्धारित हैं। इसके लिए हर बार SIR, ER या SSR का इंतजार करना जरूरी नहीं है।

पात्र व्यक्ति Form 6 भरकर मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वा सकता है।

2025 से जुड़े 2.38 करोड़ नए मतदाताओं का सवाल

2025 से जुड़े करीब 2.38 करोड़ नए मतदाताओं को लेकर भी सवाल उठाए गए कि क्या इस प्रक्रिया में दोनों कमिश्नरों की भूमिका को दरकिनार किया गया था।

चुनाव आयोग ने इस दावे को भ्रम फैलाने वाला नैरेटिव बताया।

आयोग के अनुसार चुनाव आयोग में सहमति से काम का बंटवारा हुआ। आयोग के आदेश के बाद संबंधित नियम तय किए गए और प्रक्रिया को निर्धारित अधिकारों के तहत आगे बढ़ाया गया।

क्या ड्राफ्ट पर सवाल उठाना फैसले का विरोध है?

SIR के Draft Roll को लेकर सुझाव और आपत्तियों पर भी सवाल उठे।

चुनाव आयोग का कहना है कि ड्राफ्ट पर सवाल, सुझाव और आपत्तियां प्रक्रिया का हिस्सा हैं। किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल की ओर से सुझाव देना अपने आप में अंतिम निर्णय का विरोध नहीं माना जा सकता।

Draft Roll का उद्देश्य ही दावे और आपत्तियां प्राप्त करना तथा आवश्यक सुधार करना है।

सबसे बड़ा सवाल: क्या SIR “वोट चोरी” का तरीका है?

SIR को लेकर विपक्ष की ओर से “वोट चोरी” जैसे आरोप लगाए गए हैं। चुनाव आयोग ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि “वोट चोरी” जैसी कोई प्रक्रिया नहीं होती।

आयोग के अनुसार किसी मतदाता का नाम मनमाने तरीके से नहीं हटाया जाता। मतदाता सूची के सत्यापन में BLO घर-घर जाकर जानकारी का सत्यापन करते हैं।

इसके साथ ही राजनीतिक दलों के Booth Level Agents यानी BLA भी मतदाता सूची पर नजर रखते हैं।

दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मतदाता सूची को अंतिम रूप दिया जाता है।

क्या SIR पहले भी हुआ है?

यह भी महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या SIR पहली बार हो रहा है।

नहीं। चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार भारत में Intensive Revision पहले भी कई बार हो चुकी है। आयोग ने 1952-56, 1957, 1961, 1965, 1966, 1983-84, 1987-89, 1992, 1993, 1995, 2002, 2003 और 2004 जैसी अवधियों में Intensive Revision का उल्लेख किया है।

बिहार में 2025 की SIR से पहले आखिरी Intensive Revision 2003 में हुई थी।

इसलिए वर्तमान SIR को लेकर राजनीतिक बहस नई जरूर है, लेकिन मतदाता सूची की Intensive Revision की प्रक्रिया नई नहीं है।

नाम हटने के बाद क्या किया जा सकता है?

यदि किसी पात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में नहीं मिलता है तो वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत दावा या आवेदन कर सकता है।

नए पात्र मतदाताओं के लिए Form 6 के माध्यम से नाम जोड़ने की व्यवस्था है। मतदाताओं को सलाह दी जाती है कि वे अंतिम मतदाता सूची में अपना नाम जरूर जांचें और किसी गलती की स्थिति में निर्धारित समय सीमा के भीतर संबंधित अधिकारी के समक्ष दावा या आपत्ति दर्ज करें।

SIR के आंकड़े: कितने नाम हटे और कितने दोबारा जुड़े?

SIR की पूरी तस्वीर समझने के लिए केवल “13 करोड़ वोट कट गए” जैसे दावे को देखने के बजाय अलग-अलग श्रेणियों और अंतिम सूची के आंकड़ों को देखना जरूरी है।

सवालजवाब/आंकड़ा
कितने मतदाता मृत पाए गए?बिहार SIR के दौरान करीब 22 लाख मतदाताओं को मृत बताया गया।
कितने मतदाता अपने पुराने पते पर नहीं मिले?करीब 36 लाख मतदाता स्थायी रूप से स्थानांतरित या ट्रेस नहीं किए जा सके।
कितने मतदाता दूसरी जगह चले गए?करीब 35 लाख मतदाताओं के स्थायी रूप से स्थानांतरित होने या ट्रेस न होने की जानकारी दी गई।
कितने डुप्लीकेट रिकॉर्ड मिले?करीब 7 लाख मतदाता एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत पाए गए।
कितने पात्र मतदाताओं ने दावा किया?दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया में अलग-अलग श्रेणियों के आवेदन आए। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1 सितंबर तक नए मतदाताओं के लिए 16.56 लाख Form 6 आवेदन दर्ज हुए थे।
कितने नाम दोबारा जोड़े गए?अंतिम प्रक्रिया में चुनाव आयोग के अनुसार 21.53 लाख पात्र मतदाताओं को जोड़ा गया।
अंतिम मतदाता सूची में कुल कितने मतदाता हैं?30 सितंबर 2025 की अंतिम सूची में करीब 7.42 करोड़ मतदाता थे।

65 लाख नाम हटने के बाद 21.53 लाख नाम कैसे जुड़े?

1 अगस्त 2025 के Draft Roll में करीब 7.24 करोड़ मतदाता थे। इसके बाद दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया चली। चुनाव आयोग के अंतिम आंकड़े के अनुसार इस चरण में 3.66 लाख अयोग्य मतदाता हटाए गए, जबकि 21.53 लाख पात्र मतदाता जोड़े गए। इसके बाद 30 सितंबर 2025 को करीब 7.42 करोड़ मतदाताओं वाली अंतिम सूची प्रकाशित की गई।

13 करोड़ के आंकड़े को समझना क्यों जरूरी?

SIR पर पूरी बहस को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि कितने मतदाता मृत पाए गए, कितने स्थानांतरित हुए, कितने डुप्लीकेट रिकॉर्ड मिले, कितने पात्र लोगों ने दावा किया, कितने नाम दोबारा जोड़े गए और अंतिम मतदाता सूची में कुल कितने मतदाता शामिल हुए।

इन्हीं आंकड़ों से SIR के वास्तविक प्रभाव को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।

1952 से 2026 तक SIR का सफर

वर्ष/अवधिस्थिति
1952-56Intensive Revision
1957Intensive Revision
1961Intensive Revision
1965-66Intensive Revision
1983-84Intensive Revision
1987-89Revision प्रक्रिया
1992-95Revision प्रक्रियाएं
2002Intensive Revision
2003Intensive Revision
2004Intensive Revision
2025बिहार में Special Intensive Revision
2025-26अन्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में SIR प्रक्रिया

निष्कर्ष

SIR को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के दावों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। विपक्ष मतदाता सूची से नाम हटने और प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची के सत्यापन और शुद्धिकरण की प्रक्रिया बता रहा है।

इतिहास में भी Intensive Revision कई बार हो चुकी है। इसलिए SIR अपने आप में कोई नई प्रक्रिया नहीं है। हालांकि वर्तमान प्रक्रिया में कितने पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए और कितने नाम दावे-आपत्तियों के बाद वापस जुड़े, यह आंकड़े इस पूरी बहस को समझने में सबसे महत्वपूर्ण होंगे।

मतदाताओं के लिए सबसे जरूरी बात यही है कि वे अपनी अंतिम मतदाता सूची में नाम की जांच करें और नाम नहीं मिलने या जानकारी गलत होने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत Form 6, दावा या आपत्ति का इस्तेमाल करें।